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एक अनपढ़ आदमी की बुद्धिमानी

      एक छोटे से गाँव का नाम था रामपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन वहाँ के लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत , आम और नीम के पेड़ , एक पुराना तालाब और दूर तक फैली कच्ची सड़कें थीं। गाँव के अधिकांश लोग खेती करते थे। कुछ लोग पशुपालन करते थे और कुछ छोटे-मोटे व्यापार से अपना जीवन चलाते थे। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय भी था , जहाँ बच्चे पढ़ने जाते थे। गाँव के लोग शिक्षा को बहुत महत्व देते थे , लेकिन फिर भी गरीबी के कारण कई पुराने लोग पढ़-लिख नहीं पाए थे। उन्हीं लोगों में एक आदमी था—रघु। रघु लगभग पचपन वर्ष का था। वह गरीब था , अनपढ़ था और जीवन भर खेतों में मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता आया था। वह अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता था। जब भी कोई सरकारी कागज या चिट्ठी उसके घर आती , तो वह गाँव के किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से उसे पढ़वाता था। गाँव के कुछ लोग उसकी अशिक्षा का मजाक उड़ाते थे और उसे “गँवार रघु” कहकर बुलाते थे। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि रघु के पास ऐसी जीवन की समझ थी , जो कई पढ़े-लिखे लोगों के पास भी नहीं थी। ...

संघर्ष से निकला सितारा

 



 

पुजा एक छोटे-से गाँव में रहने वाली साधारण लड़की थी, लेकिन उसके सपने बिल्कुल साधारण नहीं थे। गाँव का नाम था सोनपुरा। चारों तरफ हरे-भरे खेत, मिट्टी की पगडंडियाँ, पुराने बरगद के पेड़ और दूर तक फैली सरसों की पीली चादर—सोनपुरा देखने में जितना सुंदर था, वहाँ का जीवन उतना ही कठिन था। गाँव के अधिकांश लोग खेती और मजदूरी पर निर्भर थे। बिजली कभी आती, कभी चली जाती और बारिश के दिनों में गाँव की सड़कें कीचड़ में बदल जाती थीं। इसी गाँव के किनारे मिट्टी और खपरैल से बने एक छोटे-से घर में पुजा अपने माता-पिता और छोटे भाई मोहन के साथ रहती थी। उसके पिता रामदास खेतों में मजदूरी करते थे और उसकी माँ सावित्री दूसरे घरों में काम करके परिवार की मदद करती थीं। घर में पैसे हमेशा कम रहते थे, लेकिन पुजा के पिता एक बात हमेशा कहते थे, “बेटी, गरीबी हमारी मजबूरी हो सकती है, लेकिन यह हमारे सपनों की सीमा नहीं है।”

 

पुजा बचपन से ही पढ़ने में बहुत तेज थी। उसे किताबों से इतना लगाव था कि वह अपनी पुरानी किताबों को भी बहुत संभालकर रखती थी। स्कूल से लौटने के बाद जब बाकी बच्चे खेलते थे, पुजा अक्सर घर के बाहर बने मिट्टी के चबूतरे पर बैठकर किताब पढ़ती रहती थी। उसके पास पढ़ने के लिए बहुत ज्यादा किताबें नहीं थीं। एक ही किताब को वह कई बार पढ़ती और हर बार उसमें से कुछ नया सीखने की कोशिश करती। उसकी सबसे प्रिय किताब विज्ञान की थी। आसमान में उड़ते पक्षियों को देखकर उसके मन में सवाल उठते कि इंसान क्यों नहीं उड़ सकता। रात को तारों को देखकर वह सोचती कि उन चमकते सितारों तक आखिर पहुँचा कैसे जा सकता है। कभी वह अपने पिता से सवाल करती, कभी स्कूल की शिक्षिका से। उसके सवाल इतने ज्यादा होते कि कई बार लोग उससे परेशान भी हो जाते, लेकिन उसकी विज्ञान की शिक्षिका मीरा मैडम उसकी जिज्ञासा को समझती थीं।

 

एक दिन स्कूल में विज्ञान प्रदर्शनी की घोषणा हुई। सभी विद्यार्थियों से कहा गया कि वे अपनी पसंद का कोई वैज्ञानिक मॉडल बनाकर लाएँ। पुजा के मन में तुरंत एक विचार आया। उसने सोचा कि गाँव में बिजली की समस्या बहुत बड़ी है। अगर सूरज की रोशनी से गाँव के छोटे-छोटे घरों में बिजली पैदा की जा सके तो लोगों का जीवन आसान हो सकता है। उसने मीरा मैडम को अपना विचार बताया। मैडम ने उसकी बात ध्यान से सुनी और कहा, “विचार बहुत अच्छा है, लेकिन इसे वास्तविक रूप देने के लिए मेहनत करनी होगी।” पुजा ने दृढ़ता से कहा, “मैं मेहनत करने के लिए तैयार हूँ।” अगले दिन से उसने काम शुरू कर दिया। उसने पुराने खिलौनों के मोटर, टूटी हुई टॉर्च की बैटरी, बेकार तार और कबाड़ में पड़े छोटे सोलर सेल इकट्ठा किए। उसके पास नया सामान खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए उसे कबाड़ से ही अपना मॉडल तैयार करना पड़ा।

 

पुजा कई दिनों तक रात में देर तक काम करती रही। कभी तार जल जाता, कभी मोटर काम नहीं करता और कभी बैटरी चार्ज नहीं होती। हर असफलता के बाद वह कुछ देर चुप बैठती, फिर दोबारा कोशिश करती। उसकी माँ कई बार कहतीं, “बेटी, आँखों पर इतना जोर मत डाल। सुबह स्कूल भी जाना है।” पुजा मुस्कुराकर कहती, “माँ, बस एक बार यह चल जाए, फिर मैं आराम करूँगी।” उसके पिता उसे चुपचाप देखते और उनके चेहरे पर गर्व दिखाई देता। एक रात जब पूरा गाँव अँधेरे में डूबा हुआ था, पुजा ने आखिरकार अपना छोटा-सा मॉडल चला दिया। सोलर पैनल पर पड़ रही रोशनी से एक छोटा बल्ब जल उठा। वह बल्ब बहुत छोटा था, लेकिन पुजा के लिए वह किसी सितारे से कम नहीं था। उसने खुशी से अपने पिता को बुलाया। रामदास ने बल्ब देखा और भावुक होकर कहा, “देखा बेटी, अँधेरे में भी रोशनी पैदा की जा सकती है।”

 

विज्ञान प्रदर्शनी का दिन आया। स्कूल में शहर से आए कुछ अधिकारी और शिक्षक भी उपस्थित थे। पुजा ने अपना मॉडल सबके सामने प्रस्तुत किया। उसने बताया कि किस तरह सौर ऊर्जा का उपयोग करके गाँव के छोटे घरों में रोशनी पहुँचाई जा सकती है। उसकी प्रस्तुति सरल थी, लेकिन उसमें आत्मविश्वास था। जब परिणाम घोषित हुए तो पुजा को प्रथम पुरस्कार मिला। पुरस्कार में उसे एक प्रमाणपत्र, कुछ किताबें और एक छोटी छात्रवृत्ति मिली। उसके लिए यह सिर्फ एक पुरस्कार नहीं था, बल्कि उसके सपनों की पहली सीढ़ी थी। मीरा मैडम ने उससे कहा, “पुजा, तुम्हारे अंदर कुछ अलग करने की क्षमता है। अगर तुम इसी तरह मेहनत करती रहीं तो एक दिन बहुत आगे जाओगी।” उस दिन पुजा ने तय किया कि वह बड़ी होकर वैज्ञानिक बनेगी और ऐसे आविष्कार करेगी जो गरीब लोगों की जिंदगी बदल सकें।

 

लेकिन जिंदगी हमेशा सपनों के रास्ते आसान नहीं करती। कुछ ही महीनों बाद पुजा के पिता गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। कई दिनों तक वे काम पर नहीं जा सके। घर की आमदनी लगभग बंद हो गई। दवाइयों का खर्च बढ़ता गया। सावित्री दिन-रात काम करने लगीं, लेकिन घर चलाना मुश्किल हो गया। पुजा को पहली बार महसूस हुआ कि गरीबी कितनी कठोर होती है। घर में कई दिनों तक ठीक से खाना नहीं बन पाता था। मोहन स्कूल छोड़ने की बात करने लगा क्योंकि वह अपनी माँ की मदद करना चाहता था। पुजा ने उसे समझाया, “तुम पढ़ाई नहीं छोड़ोगे। हम दोनों पढ़ेंगे और एक दिन माँ-बाबा को इस परेशानी से बाहर निकालेंगे।”

 

पुजा भी स्कूल छोड़कर काम करने के बारे में सोचने लगी। उसे लगा कि अगर वह किसी दुकान पर काम कर ले तो घर में कुछ पैसे आ सकते हैं। जब उसने यह बात मीरा मैडम को बताई तो मैडम ने उसे समझाया, “मदद करना अच्छी बात है, लेकिन अपनी पढ़ाई छोड़ देना समाधान नहीं है। अगर तुम पढ़ाई पूरी करोगी तो भविष्य में अपने परिवार के लिए बहुत कुछ कर पाओगी।” पुजा की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा, “मैडम, लेकिन अभी घर में पैसे नहीं हैं।” मीरा मैडम ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “कभी-कभी रास्ता दिखाई नहीं देता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रास्ता है ही नहीं।”

 

मीरा मैडम ने पुजा के लिए स्कूल की छात्रवृत्ति की व्यवस्था करवाई। कुछ शिक्षकों ने मिलकर उसकी किताबों और फीस का खर्च उठाया। पुजा ने भी छुट्टी के समय गाँव के छोटे बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। इससे उसे थोड़े पैसे मिलने लगे। वह सुबह जल्दी उठती, घर का काम करती, स्कूल जाती, लौटकर बच्चों को पढ़ाती और रात में अपनी पढ़ाई करती। उसका जीवन कठिन था, लेकिन उसके सपने अब पहले से बड़े हो चुके थे। वह समझ चुकी थी कि संघर्ष से भागने के बजाय उसका सामना करना होगा।

 

दसवीं कक्षा की परीक्षा नजदीक आ रही थी। पुजा ने दिन-रात मेहनत की। वह जानती थी कि अच्छे अंक मिलने पर उसे शहर के अच्छे विद्यालय में छात्रवृत्ति मिल सकती है। परीक्षा के दिनों में गाँव में बिजली अक्सर गायब रहती थी। तब पुजा लालटेन की रोशनी में पढ़ती। कई बार मिट्टी का तेल खत्म हो जाता तो वह घर के बाहर चाँदनी में किताब लेकर बैठ जाती। एक रात उसके पिता ने उसे देखा और बोले, “बेटी, इतना मत पढ़ कि तुम्हारी आँखें थक जाएँ।” पुजा ने मुस्कुराकर कहा, “बाबा, मुझे लगता है कि मेरी मंजिल मुझे बुला रही है।” पिता ने जवाब दिया, “तो जा बेटी, लेकिन रास्ते में चाहे जितने काँटे मिलें, रुकना मत।”

 

परीक्षा का परिणाम आया तो पुजा ने पूरे जिले में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए। उसके स्कूल में खुशी का माहौल था। अखबार में उसकी तस्वीर छपी। गाँव के लोग पहली बार उसे अलग नजर से देखने लगे। कुछ लोग उसकी प्रशंसा करने लगे, लेकिन कुछ लोग ताना भी मारते थे। एक पड़ोसी ने उसके पिता से कहा, “लड़की को इतना पढ़ाकर क्या करोगे? आखिर उसे शादी करके दूसरे घर जाना है।” रामदास ने शांत स्वर में कहा, “मेरी बेटी जहाँ जाएगी, वहाँ अपना नाम बनाएगी। बेटी बोझ नहीं होती, बेटी घर की रोशनी होती है।” पुजा ने अपने पिता की बात सुनी और उसके भीतर आत्मविश्वास और बढ़ गया।

 

उसे शहर के एक अच्छे विद्यालय में छात्रवृत्ति मिल गई। लेकिन शहर जाना भी आसान नहीं था। गाँव से शहर तक रोज आने-जाने का खर्च बहुत था, इसलिए उसे छात्रावास में रहना पड़ा। पहली बार पुजा अपने परिवार से दूर जा रही थी। उसकी माँ उसे छोड़ते समय बहुत रोईं। मोहन ने कहा, “दीदी, जल्दी वापस आना।” पुजा ने उसे गले लगाकर कहा, “मैं पढ़ाई पूरी करके वापस आऊँगी। फिर हम अपने गाँव में बहुत कुछ बदलेंगे।” पिता ने उसे एक पुरानी घड़ी दी और कहा, “यह घड़ी मेरे पिता की थी। इसे अपने पास रखना। जब भी मुश्किल समय आए, याद रखना कि समय कभी एक जैसा नहीं रहता।”

 

शहर का जीवन पुजा के लिए बिल्कुल नया था। वहाँ ऊँची इमारतें थीं, बड़ी-बड़ी दुकानें थीं और हर जगह तेज रफ्तार थी। उसके विद्यालय में पढ़ने वाले अधिकतर बच्चे बड़े शहरों से आए थे। उनके पास महंगे फोन, लैपटॉप और कोचिंग की सुविधाएँ थीं। पुजा के पास न लैपटॉप था, न महंगे नोट्स। वह पुस्तकालय में घंटों बैठकर पढ़ती। कभी-कभी उसे अपने गाँव और परिवार की बहुत याद आती। उसे लगता कि शायद वह इस दुनिया के लिए बनी ही नहीं है। लेकिन हर बार वह अपने पिता की बात याद करती—“गरीबी सपनों की सीमा नहीं है।”

 

कुछ समय बाद स्कूल में एक राष्ट्रीय विज्ञान प्रतियोगिता की घोषणा हुई। पुजा ने उसमें हिस्सा लेने का फैसला किया। इस बार उसने सिर्फ सोलर लाइट बनाने के बजाय ऐसा मॉडल बनाने का निर्णय लिया जो ग्रामीण इलाकों में कम लागत में पानी की समस्या और बिजली की समस्या दोनों का समाधान कर सके। उसने एक सौर ऊर्जा आधारित जल शुद्धिकरण प्रणाली पर काम शुरू किया। कई विद्यार्थियों ने उसका मजाक उड़ाया। एक छात्र ने कहा, “तुम गाँव से आई हो, तुम्हें इतना बड़ा प्रोजेक्ट बनाने की क्या जरूरत है?” पुजा ने कुछ नहीं कहा। उसने अपने मन में तय किया कि जवाब शब्दों से नहीं, परिणाम से देगी।

 

कई महीनों की मेहनत के बाद उसका मॉडल तैयार हुआ। उसने सौर ऊर्जा की मदद से पानी को फिल्टर करने और छोटे स्तर पर उसे शुद्ध करने की प्रणाली बनाई। मॉडल पूरी तरह परिपूर्ण नहीं था, लेकिन उसमें बहुत संभावनाएँ थीं। प्रतियोगिता के दिन देशभर से विद्यार्थी आए। पुजा ने आत्मविश्वास के साथ अपना प्रोजेक्ट प्रस्तुत किया। निर्णायकों ने उससे कई कठिन सवाल पूछे। उसने हर सवाल का जवाब पूरी ईमानदारी से दिया। अंतिम परिणाम में उसे दूसरा स्थान मिला। वह प्रथम स्थान से सिर्फ कुछ अंकों से पीछे रह गई थी। पुजा को थोड़ी निराशा हुई, लेकिन उसके प्रोजेक्ट को एक वैज्ञानिक संस्था ने आगे विकसित करने के लिए चुन लिया।

 

यह पुजा के जीवन का बड़ा मोड़ था। उसे पहली बार वैज्ञानिकों के साथ काम करने का अवसर मिला। उसने प्रयोगशाला में नई तकनीकें सीखीं। वहाँ उसने जाना कि विज्ञान केवल किताबों में लिखे सिद्धांतों का नाम नहीं है, बल्कि लोगों की समस्याओं का समाधान खोजने का माध्यम भी है। उसने अपने गाँव की समस्याओं को याद रखा। उसे हमेशा लगता था कि अगर उसके गाँव के लोग साफ पानी, बिजली और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, तो उसकी पढ़ाई का असली उद्देश्य अधूरा है।

 

लेकिन इसी दौरान उसके पिता की बीमारी फिर बढ़ गई। पुजा गाँव लौटना चाहती थी, लेकिन उसकी पढ़ाई और शोध भी महत्वपूर्ण चरण में था। वह अंदर से टूटने लगी। उसने अपनी माँ से फोन पर कहा, “माँ, मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ।” माँ ने कहा, “बेटी, जीवन में हर चीज हमारे हिसाब से नहीं होती। तुम्हारे पिता हमेशा कहते हैं कि तुम अपना सपना पूरा करो। इसलिए पीछे मत हटना।” पुजा ने आँसू पोंछे और खुद को संभाला।

 

कुछ दिनों बाद उसे खबर मिली कि उसके पिता की हालत बहुत गंभीर है। वह तुरंत गाँव पहुँची। पिता ने उसे कमजोर आवाज में बुलाया और कहा, “तू वापस आई, यही मेरे लिए काफी है।” पुजा उनके पास बैठ गई। उसने कहा, “बाबा, मैं अपनी पढ़ाई छोड़ दूँ?” रामदास ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोले, “नहीं बेटी। अगर तू आज रुक गई तो मेरी सारी मेहनत अधूरी रह जाएगी। मैं चाहता हूँ कि तू वह करे जो मैंने कभी नहीं कर पाया।” पुजा रोने लगी। पिता ने कहा, “तू आसमान में चमकने वाले सितारे को देखती थी ना? याद रख, सितारा बनने के लिए आसमान में जन्म लेना जरूरी नहीं। अँधेरे से निकलकर भी इंसान चमक सकता है।”

 

कुछ दिनों बाद रामदास इस दुनिया से चले गए। पुजा के जीवन में यह सबसे बड़ा आघात था। उसे लगा जैसे उसके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई हो। वह कई दिनों तक किसी से बात नहीं कर सकी। उसकी किताबें सामने पड़ी रहतीं, लेकिन वह उन्हें खोलती नहीं थी। एक दिन उसने अपने पिता की दी हुई पुरानी घड़ी हाथ में ली। उसे पिता की आखिरी बात याद आई। उसने आँसू पोंछे और अपनी किताब खोल दी। उसने मन ही मन कहा, “बाबा, मैं रुकूँगी नहीं।”

 

इसके बाद पुजा पहले से भी ज्यादा मेहनत करने लगी। उसने अपनी पढ़ाई पूरी की और उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति प्राप्त की। विश्वविद्यालय में उसने नवीकरणीय ऊर्जा और ग्रामीण तकनीक पर शोध करना शुरू किया। उसने ऐसे सौर ऊर्जा उपकरण पर काम किया जिसे कम लागत में गाँवों में इस्तेमाल किया जा सके। उसका उद्देश्य था कि गरीब परिवार भी इसे खरीद सकें। कई बार उसके प्रयोग असफल हुए। एक पूरा प्रोटोटाइप महीनों की मेहनत के बाद खराब हो गया। उसके साथी निराश हो गए। लेकिन पुजा ने कहा, “असफल प्रयोग हमें बताता है कि क्या काम नहीं करता। यह भी सफलता की ओर एक कदम है।”

 

उसका शोध धीरे-धीरे सफल होने लगा। उसने एक कम लागत वाली सौर ऊर्जा प्रणाली विकसित की, जिससे घर में रोशनी के साथ मोबाइल चार्जिंग और छोटे उपकरण चलाए जा सकते थे। उसने इसे विशेष रूप से ग्रामीण परिवारों के लिए डिजाइन किया। उसके प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला। उसे एक प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मंच पर जब उसका नाम पुकारा गया तो पुजा की आँखों के सामने उसका गाँव, मिट्टी का घर, लालटेन, माँ का संघर्ष, मोहन का चेहरा और पिता की मुस्कान घूम गई।

 

पुरस्कार लेने के बाद पत्रकारों ने उससे पूछा, “आपकी सफलता का रहस्य क्या है?” पुजा ने कहा, “मेरी सफलता के पीछे मेरी असफलताएँ हैं। अगर मेरे जीवन में गरीबी नहीं होती तो शायद मैं बिजली की समस्या को इतनी गहराई से महसूस नहीं करती। अगर मेरे पिता ने संघर्ष नहीं किया होता तो शायद मैं मेहनत का अर्थ नहीं समझती। अगर मुझे बार-बार असफलता नहीं मिलती तो शायद मैं धैर्य नहीं सीखती। मैं मानती हूँ कि संघर्ष इंसान को तोड़ता नहीं, अगर वह हिम्मत रखे तो उसे मजबूत बनाता है।”

 

पुजा ने नौकरी करने के बजाय अपना एक सामाजिक संगठन शुरू करने का निर्णय लिया। उसने अपने संगठन का नाम रखा “नई रोशनी।” उसका उद्देश्य था ग्रामीण क्षेत्रों में कम लागत वाली सौर ऊर्जा, शिक्षा और विज्ञान की सुविधाएँ पहुँचाना। उसने अपने गाँव सोनपुरा से काम शुरू किया। गाँव में सोलर लाइटें लगाई गईं। स्कूल में एक छोटा विज्ञान केंद्र बनाया गया। बच्चों के लिए किताबें और प्रयोगशाला के उपकरण लाए गए। लड़कियों के लिए विशेष विज्ञान कक्षाएँ शुरू की गईं।

 

जब पुजा कई वर्षों बाद अपने गाँव लौटी तो वही पगडंडी थी, वही बरगद का पेड़ था, वही खेत थे, लेकिन गाँव बदलने लगा था। जिन घरों में कभी रात होते ही अँधेरा छा जाता था, वहाँ अब सोलर लाइटें जल रही थीं। बच्चे शाम को भी पढ़ पा रहे थे। स्कूल की दीवारों पर विज्ञान के चित्र बने थे। गाँव की लड़कियाँ अब सिर्फ पढ़ाई ही नहीं कर रही थीं, बल्कि विज्ञान मॉडल भी बना रही थीं।

 

मोहन भी बड़ा हो चुका था। उसने अपनी बहन से प्रेरणा लेकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। माँ सावित्री अब उम्रदराज हो चुकी थीं। पुजा ने उनके लिए घर पक्का बनवा दिया था, लेकिन वह अपने पुराने मिट्टी के घर को कभी नहीं भूली। उसने उस घर का एक हिस्सा सुरक्षित रखा। वहाँ उसने अपने पिता की तस्वीर लगाई और उनके पास वह पुरानी घड़ी रख दी।

 

एक दिन गाँव के स्कूल में पुजा को मुख्य अतिथि बनाकर बुलाया गया। मंच पर खड़ी होकर उसने सामने बैठे बच्चों को देखा। उनमें कई ऐसे बच्चे थे जिनके पास संसाधन नहीं थे, लेकिन आँखों में सपने थे। उसने कहा, “मैं भी कभी इसी स्कूल में बैठती थी। मेरे पास महंगी किताबें नहीं थीं। मेरे घर में बिजली नहीं थी। मेरे पिता मजदूर थे। मुझे भी कई बार लगा कि मैं अपने सपनों तक नहीं पहुँच पाऊँगी। लेकिन मैंने एक बात सीखी—मुश्किलें हमारे रास्ते को रोकने नहीं, हमें मजबूत बनाने आती हैं।”

 

उसने बच्चों से कहा, “अगर आपके पास संसाधन कम हैं तो अपनी मेहनत बढ़ाइए। अगर कोई आप पर हँसता है तो अपने लक्ष्य पर ध्यान दीजिए। अगर आप असफल होते हैं तो खुद को असफल मत समझिए। असफलता केवल एक परिणाम है, आपकी पहचान नहीं। और सबसे जरूरी बात—अपने सपनों को किसी दूसरे की सोच के कारण छोटा मत कीजिए।”

 

भीड़ में बैठी एक छोटी लड़की ने हाथ उठाकर पूछा, “मैडम, क्या मैं भी वैज्ञानिक बन सकती हूँ? मेरे घर में भी बिजली नहीं है।”

 

पुजा मुस्कुराई। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा, “बिल्कुल बन सकती हो। शायद तुम्हीं वह वैज्ञानिक बनो जो एक दिन दुनिया की सबसे बड़ी समस्या का समाधान करे।”

 

उस दिन पुजा ने महसूस किया कि उसका संघर्ष अब केवल उसकी व्यक्तिगत कहानी नहीं रहा था। उसकी कहानी उन हजारों बच्चों की उम्मीद बन चुकी थी जो परिस्थितियों के कारण अपने सपनों को छोटा समझ लेते हैं।

 

समय बीतता गया। “नई रोशनी” संस्था ने कई गाँवों में काम शुरू किया। पुजा की टीम ने सौर ऊर्जा, वर्षा जल संग्रहण, कम लागत वाली शिक्षा तकनीक और ग्रामीण विज्ञान प्रयोगशालाओं पर काम किया। कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने उसके काम की सराहना की। उसे विदेशों में व्याख्यान देने के लिए भी बुलाया गया, लेकिन हर बार वह अपने गाँव लौटना नहीं भूलती थी। उसके लिए सफलता का अर्थ केवल पुरस्कार या प्रसिद्धि नहीं था। उसके लिए सफलता का मतलब था—किसी गरीब बच्चे के घर में रोशनी जलना, किसी लड़की का स्कूल जाना और किसी किसान के घर में साफ पानी पहुँचना।

 

एक शाम पुजा अपने गाँव के बाहर उसी पुराने बरगद के पेड़ के नीचे बैठी थी। आसमान में सूरज डूब रहा था। कुछ देर बाद अँधेरा छाने लगा और आसमान पर एक-एक करके सितारे दिखाई देने लगे। पुजा ने ऊपर देखा। उसे अपने पिता की आवाज जैसे सुनाई दी—“सितारा बनने के लिए आसमान में जन्म लेना जरूरी नहीं।” वह हल्के से मुस्कुराई।

 

उसके पास अब बहुत कुछ था—सम्मान, सफलता, पैसा और पहचान। लेकिन उसे सबसे ज्यादा गर्व इस बात पर था कि उसने अपनी कठिन परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उसने गरीबी को अपनी सोच पर हावी नहीं होने दिया। उसने असफलताओं को अपनी मंजिल का अंत नहीं माना। उसने दर्द को शक्ति में बदला और संघर्ष को अपनी पहचान बना लिया।

 

पुजा की कहानी धीरे-धीरे पूरे देश में प्रसिद्ध हो गई। लोग उसे “संघर्ष से निकला सितारा” कहने लगे। लेकिन जब भी कोई उससे यह नाम कहता, वह मुस्कुराकर कहती, “मैं सितारा नहीं हूँ। मैं तो बस एक ऐसी लड़की हूँ जिसने अँधेरे में रोशनी खोजने की कोशिश की। असली सितारे तो वे लोग हैं जो मुश्किल हालात में भी अपने सपनों को जिंदा रखते हैं।”

 

उसकी कहानी का सबसे सुंदर हिस्सा यह था कि उसने अपनी सफलता को अपने तक सीमित नहीं रखा। उसने जिस रोशनी को कभी एक छोटे-से बल्ब में देखा था, उसे हजारों घरों तक पहुँचाया। जिस किताब को पढ़ने के लिए वह कभी लालटेन के नीचे बैठती थी, उसी ज्ञान को उसने हजारों बच्चों तक पहुँचाया। जिस दिन उसके पिता ने कहा था कि अँधेरे में भी रोशनी पैदा की जा सकती है, उस दिन से लेकर आज तक पुजा ने उसी विश्वास को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था।

 

कई साल बाद सोनपुरा गाँव का स्कूल एक बड़े विज्ञान केंद्र में बदल चुका था। स्कूल के मुख्य द्वार पर एक पत्थर की पट्टिका लगी थी, जिस पर लिखा था—“सपनों की कोई गरीबी नहीं होती।” नीचे छोटे अक्षरों में पुजा का नाम लिखा था। स्कूल की दीवार पर उसकी एक तस्वीर लगी थी, लेकिन पुजा ने उस तस्वीर के नीचे अपना नाम लिखने के बजाय एक पंक्ति लिखवाई थी—“संघर्ष से मत डरिए, क्योंकि कभी-कभी वही संघर्ष आपको उस ऊँचाई तक ले जाता है जहाँ से पूरी दुनिया छोटी नहीं, बल्कि संभावनाओं से भरी दिखाई देती है।”

 

रात को जब गाँव के बच्चे अपने घरों में सोलर लाइट के नीचे पढ़ते थे, तो दूर से छोटे-छोटे बल्ब ऐसे दिखाई देते थे जैसे जमीन पर हजारों सितारे उतर आए हों। पुजा अक्सर उन्हें देखकर चुपचाप मुस्कुराती थी। उसे लगता था कि उसके पिता का सपना सच हो गया है।

 

पुजा ने साबित कर दिया था कि जिंदगी चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो, अगर इंसान के भीतर विश्वास, मेहनत और धैर्य हो तो वह अपनी किस्मत की कहानी खुद लिख सकता है। संघर्ष रास्ते में आने वाली दीवार हो सकता है, लेकिन वही संघर्ष उस इंसान को मजबूत भी बनाता है जो उसे पार करने की हिम्मत रखता है। पुजा की जिंदगी इस बात की मिसाल बन गई कि परिस्थितियाँ किसी इंसान की शुरुआत तय कर सकती हैं, लेकिन उसका अंत नहीं। गरीब घर में जन्म लेना उसकी मजबूरी थी, लेकिन बड़ा सपना देखना उसका अधिकार था। और उस सपने को पूरा करना उसकी मेहनत।

 

आसमान में उस रात एक बहुत चमकीला सितारा दिखाई दे रहा था। पुजा ने उसे देखा और मन ही मन अपने पिता से कहा, “बाबा, आपने सही कहा था। अँधेरे से निकलकर भी इंसान चमक सकता है।”

 

और सचमुच, मिट्टी के छोटे-से घर से निकलकर पुजा ने अपने संघर्षों को सीढ़ी बनाया, अपनी असफलताओं को शिक्षक बनाया, अपने आँसुओं को ताकत बनाया और अपने सपनों को ऐसी रोशनी में बदल दिया जिसने न केवल उसकी जिंदगी, बल्कि हजारों लोगों की जिंदगी बदल दी।

 

यही थी पुजा की कहानी—एक ऐसी लड़की की कहानी, जिसने संघर्ष से हारने के बजाय संघर्ष को अपनी पहचान बना लिया और आखिरकार सचमुच एक सितारा बन गई।

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हमारी साइकिल है फर्राटेदार लेकर जाती हमको गांव के उस पार ओ हो निकला हूं मैं करने दूध का व्यापार मनसुख सुनीता चाची के घर के बाहर साइकिल रोकता है और घंटी बजाता है हे काकी आ जाओ दूध ले लो लाओ भाई आज जरा आधा लीटर दूध ज्यादा दे देना मेरी बिटिया को खीर खाने का मन है हां हां अभी ले लो बढ़िया सी खीर बनाकर कर खिलाना बिटिया को। मनसुख फिर से साइकिल लेकर दूसरे घर दूध देने चला जाता है। अरे मनसुख भाई ये लो तुम्हारे दूध के पैसे। आज महीना पूरा हो गया ना ? हां दीदी लाओ दो। आपका हिसाब एकदम साफ रहता है। आप एकदम समय पर पैसे दे देती हो। अरे मनसुख भैया , तुम गांव में सबसे सस्ता दूध देते हो और रोज समय पर भी आते हो। तो फिर हमारा तो फर्ज बनता है ना कि तुम्हें समय से तुम्हारे पैसे दें। अरे आपका धन्यवाद दीदी। अच्छा मैं चलता हूं। हां। इस दूध वाले की ज्यादा तारीफ नहीं कर रही थी तुम। अरे तो और क्या ? सच ही तो कह रही थी। मैंने कुछ गलत कहा क्या ? अरे मनसुख इतना ईमानदार है बेचारा। पहले हम शहर से पैकेट वाला दूध मंगाते थे। वो कितना महंगा पड़ता है और उसे लेने के लिए आपको इतनी दूर दुकान तक जाना पड़ता था। बेचारा मनसुख तो...

शेरू: एक वफ़ादार आत्मा

गाँव के बाहर पीपल के एक पुराने पेड़ के नीचे एक छोटा-सा कुत्ता अक्सर बैठा दिखाई देता था। उसकी आँखें भूरी थीं , लेकिन उनमें एक अजीब-सी चमक थी , जैसे उसने बहुत कुछ देखा हो , बहुत कुछ सहा हो। गाँव वाले उसे “शेरू” कहकर बुलाते थे , हालाँकि कोई नहीं जानता था कि उसका असली नाम क्या है , या कभी कोई नाम था भी या नहीं। शेरू जन्म से आवारा नहीं था , लेकिन परिस्थितियों ने उसे आवारा बना दिया था। वह कभी किसी के घर का प्यारा पालतू रहा होगा , यह उसकी आदतों से साफ झलकता था—वह इंसानों से डरता नहीं था , बच्चों के पास जाते समय पूँछ हिलाता था , और किसी के बुलाने पर तुरंत ध्यान देता था। शेरू को सबसे ज़्यादा पसंद था सुबह का समय। जब सूरज धीरे-धीरे खेतों के पीछे से निकलता और हवा में ठंडक घुली रहती , तब वह पूरे गाँव का चक्कर लगाता। कहीं कोई रोटी का टुकड़ा मिल जाए , कहीं कोई दुलार कर दे , तो उसका दिन बन जाता। लेकिन गाँव के ज़्यादातर लोग उसे बस एक आवारा कुत्ता ही समझते थे—कोई पत्थर मार देता , कोई डाँट देता , और कोई अनदेखा कर देता। फिर भी शेरू का भरोसा इंसानों से कभी पूरी तरह टूटा नहीं। गाँव में एक छोटा-सा घर था , जह...